Best dadi Maa ki kahaniya for kids 2

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Top 7 dadi Maa ki kahaniya in hindi for kids 

Best dadi Maa ki kahaniya for kids 2
Best dadi Maa ki kahaniya for kids 2

अकबर बीरबल की कहानियाँ

एक दिन बीरबल दरबार में देर से पहुंचा। जब बादशाह ने देरी का कारण पूछा तो वह बोला, मैं क्या करता हुजूर! मेरे बच्चे आज जोर-जोर से रोकर कहने लगे कि दरबार में न जाऊं। किसी तरह उन्हें बहुत मुश्किल से समझा पाया कि मेरा दरबार में हाजिर होना कितना जरूरी है। इसी में मुझे काफी समय लग गया और इसलिए मुझे आने में देर हो गई।

बादशाह को लगा कि बीरबल बहानेबाजी कर रहा है।

बीरबल के इस उत्तर से बादशाह को तसल्ली नहीं हुई। वे बोले, मैं तुमसे सहमत नहीं हूं। किसी भी बच्चे को समझाना इतना मुश्किल नहीं जितना तुमने बताया। इसमें इतनी देर तो लग ही नहीं सकती।

बीरबल हंसता हुआ बोला, हुजूर! बच्चे को गुस्सा करना या डपटना तो बहुत सरल है। लेकिन किसी बात को विस्तार से समझा पाना बेहद कठिन।

अकबर बोले, मूर्खों जैसी बात मत करो। मेरे पास कोई भी बच्चा लेकर आओ। मैं तुम्हें दिखाता हूं कि कितना आसान है यह काम।
ठीक है, जहांपनाह! बीरबल बोला, मैं खुद ही बच्चा बन जाता हूँ और वैसा ही व्यवहार करता हूं। तब आप एक पिता की भांति मुझे संतुष्ट करके दिखाएं।

फिर बीरबल ने छोटे बच्चे की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया। उसने तरह-तरह के मुंह बनाकर अकबर को चिढ़ाया और किसी छोटे बच्चे की तरह दरबार में यहां-वहां उछलने-कूदने लगा। उसने अपनी पगड़ी जमीन पर फेंक दी। फिर वह जाकर अकबर की गोद में बैठ गया और लगा उनकी मूछों से छेड़छाड़ करने।

बादशाह कहते ही रह गए, नहीं…नहीं मेरे बच्चे! ऐसा मत करो। तुम तो अच्छे बच्चे हो न। सुनकर बीरबल ने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया। तब अकबर ने कुछ मिठाइयां लाने का आदेश दिया, लेकिन बीरबल जोर-जोर से चिल्लाता ही रहा।

अब बादशाह परेशान हो गए, लेकिन उन्होंने धैर्य बनाए रखा। वह बोले, बेटा! खिलौनों से खेलोगे? देखो कितने सुंदर खिलौने हैं। बीरबल रोता हुआ बोला, नहीं, मैं तो गन्ना खाऊंगा।

अकबर मुस्कराए और गन्ना लाने का आदेश दिया।
थोड़ी ही देर में एक सैनिक कुछ गन्ने लेकर आ गया। लेकिन बीरबल का रोना नहीं थमा। वह बोला, मुझे बड़ा गन्ना नहीं चाहिए, छोटे-छोटे टुकड़े में कटा गन्ना दो।

अकबर ने एक सैनिक को बुलाकर कहा कि वह एक गन्ने के छोटे-छोटे टुकड़े कर दे। यह देखकर बीरबल और जोर से रोता हुआ बोला, नहीं, सैनिक गन्ना नहीं काटेगा। आप खुद काटें इसे।

अब बादशाह का मिजाज बिगड़ गया। लेकिन उनके पास गन्ना काटने के अलावा और कोई चारा न था। और करते भी क्या ?खुद अपने ही बिछाए जाल में फंस गए थे वह।
गन्ने के टुकड़े करने के बाद उन्हें बीरबल के सामने रखते हुए बोले अकबर, लो इसे खा लो बेटा।

अब बीरबल ने बच्चे की भांति मचलते हुए कहा, नहीं मैं तो पूरा गन्ना ही खाऊंगा।
बादशाह ने एक साबुत गन्ना उठाया और बीरबल को देते हुए बोले, लो पूरा गन्ना और रोना बंद करो।

लेकिन बीरबल रोता हुआ ही बोला, नहीं, मुझे तो इन छोटे टुकड़ों से ही साबुत गन्ना बनाकर दो।
कैसी अजब बात करते हो तुम! यह भला कैसे संभव है? बादशाह के स्वर में क्रोध भरा था।

लेकिन बीरबल रोता ही रहा। बादशाह का धैर्य चुक गया। बोले, यदि तुमने रोना बन्द नहीं किया तो मार पड़ेगी तब।
अब बच्चे का अभिनय करता बीरबल उठ खड़ा हुआ और हंसता हुआ बोला, नहीं…नहीं;! मुझे मत मारो हुजूर! अब आपको पता चला कि बच्चे की बेतुकी जिदों को शांत करना कितना मुश्किल काम है?

बीरबल की बात से सहमत थे अकबर, बोले, हां ठीक कहते हो। रोते-चिल्लाते जिद पर अड़े बच्चे को समझाना बच्चों का खेल नहीं।

सियार और बन्दर

प्राचीन काल बात है, दो ब्यक्ति आपस में बहुत अच्छे मित्र थे, पर दूसरे जन्म में उनमें से एक को सियार की योनि मिली और दूसरा  बन्दर बना।
            सियार जो था, वह शमशान में रहा करता थाऔर मुर्दों का भोजन किया करता था। वहीँ एक वृक्ष था, उसपर एक बन्दर भी रहा करता था। विशेष बात यह थी कि दोनों को अपने पूर्वजन्म की साडी बातें याद थीं।
           एक दिन वृक्ष पर बैठे बन्दर ने सियार से जिज्ञासावश पूछा-सियार भाई! तुम पूर्वजन्म में कौन थे और तुम ने कौन सा ऐसा निंदनीय कार्य किया था, जिस से तुम्हें सियार की पशु-योनि प्राप्त हुई है और ऐसे घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दे से अपना पेट भरना पड़ रहा है। इसपर सियार ने दुखी होते हुए कहा-
            भाई वानर! क्या बताऊँ। पूर्वजन्म मैं मनुष्य-योनि में था और मैंने एक ब्रह्मण देवता को एक वस्तु देने की प्रतिज्ञा कर के फिर उन्हें वह वस्तु दी नहीं थी, इसी प्रतिज्ञा-भंग के दोष से मुझे यह दुखित पापयोनि प्राप्त हुई है। आब तो अपने कर्मका भोग भोगना ही है। मेरी तो बात हो गई, आब तुम बताओ कि तुमने कौन सा पाप किया था?
            इस पर वानर बोला-सियार भाई! में भी पहले मनुष्य ही था। किन्तु मेरा यह स्वभाव था कि में सदा ब्राहमणों के फल चुराकर ख्य करता था। इसी पापकर्म से मुझे यह वानर-योनि प्राप्त हुई है। इस लिए किसी की भी आशाको भंग नहीं करना चाहिए। संकल्प किया गया दान अवश्य ही देना चाहिए अन्यथा दुसरे जन्म में महां कष्ट उठाना पड़ता है। 


खुशी संसार मेँ नहीँ !
एक बार की बात है कि एक शहर में बहुत अमीर सेठ रहता था| अत्यधिक धनी होने पर भी वह हमेशा दुःखी ही रहता था| एक दिन ज़्यादा परेशान होकर वह एक ऋषि के पास गया और उसने अपनी सारी समस्या ऋषि को बताई | उन्होने सेठ की हुई बात ध्यान से सुनी और सेठ से कहा कि कल तुम इसी वक्त फिर से मेरे पास आना , मैं कल ही तुम्हें तुम्हारी सारी समस्याओं का हल बता दूँगा |

               सेठ खुशी खुशी घर गया और अगले दिन जब फिर से ऋषि के पास आया तो उसने देखा कि ऋषि सड़क पर कुछ ढूँढने में व्यस्त थे| सेठ ने गुरु जी से पूछा कि महर्षि आप क्या ढूँढ रहे हैं , गुरुजी बोले कि मेरी एक अंगूठी गिर गयी है मैं वही ढूँढ रहा हूँ पर काफ़ी देर हो गयी है लेकिन अंगूठी मिल ही नहीं रही है|
              यह सुनकर वह सेठ भी अंगूठी ढूँढने में लग गया, जब काफ़ी देर हो गयी तो सेठ ने फिर गुरु जी से पूछा कि आपकी अंगूठी कहाँ गिरी थी| ऋषि ने जवाब दिया कि अंगूठी मेरे आश्रम में गिरी थी पर वहाँ काफ़ी अंधेरा है इसीलिए मैं यहाँ सड़क पर ढूँढ रहा हूँ| सेठ ने चौंकते हुए पूछा कि जब आपकी अंगूठी आश्रम में गिरी है तो यहाँ क्यूँ ढूँढ रहे हैं| ऋषि ने मुस्कुराते हुए कहा कि यही तुम्हारे कल के प्रश्न का उत्तर है, खुशी तो मन में छुपी है लेकिन तुम उसे धन में खोजने की कोशिश कर रहे हो| इसीलिए तुम दुःखी हो, यह सुनकर सेठ ऋषि के पैरों में गिर गया|

              तो मित्रों, यही बात हम लोगों पर भी लागू होती है जीवन भर पैसा इकट्ठा करने के बाद भी इंसान खुश नहीं रहता क्यूंकि हम पैसा कमाने में इतना मगन हो जाते हैं और अपनी खुशी आदि सब कुछ भूल जाते हैं |"

माँ बाप
उन सब चीजो से अनजान वो अपने माता पिता की सेवा करता रहा| एक दिन उसकी माँ बाप की सेवा भक्ति से खुश होकर भगवान धरती पे आ गए| उस वक्त वो बालक अपनी माँ के पाँव दबा रहा था, भगवान दरवाजे के बाहर से बोले, दरवाजा खोलो बेटा, मैं तुम्हारी माता पिता की सेवा से प्रसन्न होकर वरदान देने आया हूँ| लड़के ने कहा-इंतजार करो प्रभु, मैं माँ की सेवा मे लगा हूँ|
               भगवान बोले-देखो मैं वापस चला जाऊँगा, बालक- आप जा सकते है भगवान, मैं सेवा बीच मे नही छोड़ सकता| कुछ देर बाद उसने दरवाजा खोला, भगवान बाहर खड़े थे| बोले- लोग मुझे पाने के लिए कठोर तपस्या करते है, मैं तुम्हे सहज मे मिल गया और तुमने मुझसे प्रतीक्षा करवाई लड़के का जवाब था- 'हे ईश्वर, जिस माँ बाप की सेवा ने आपको मेरे पास आने को मजबूर कर दिया, उन माँ बाप की सेवा बीच मे छोड़कर मैं, दरवाजा खोलने कैसे आता|
             और यही इस जिंदगी का सार है, जिंदगी मे हमारे माँ बाप से बढ़कर कुछ नही है. हमारे माँ बाप ही हमे ये जिंदगी देते  एक बालक ने अपने माँ बाप की खूब सेवा की.दोस्त उससे कहते कि अगर इतनी सेवातुमने भगवान की की होती, तो तुम्हे भगवान मिल जाते|
                 लेकिन  है. यही माँ बाप अपना पेट काटकर बच्चो के लिए अपना भविष्य खराब कर देते है. इसके बदले हमारा भी ये फर्ज बनता है कि हम कभी उन्हे दुःख ना दे. उनकी आँखो मे आँसू कभी ना आए, चाहे परिस्थिति जो भी हो
मानव-जीवन पाकर भी, भगवत्प्राप्ति का उद्देश्य समझकर भी मनुष्य दिग्भ्रमित क्यों रहता है? क्या जीवन उसे उसकी इच्छा से प्राप्त हुआ है? अमुक वंश या अमुक जाति में जन्म पाना मनुष्य के बस की बात नहीं है| फिर क्यों न मनुष्य जहाँ प्रभु की इच्छासे जीवन जीने का स्थान मिला, उसे ही अपनी कर्मभूमि समझ अपने योग्यतानुसार प्रभु कार्य में लगाकर अपना जीवन सफल करने का प्रयास करे|
                मनुष्य को जो कुछ भगवान ने दिया है उसके प्रति आभार ब्यक्त करने की अपेक्षा जो नहीं मिला उसे लेकर वह चिंतित तथा दु:खी रहता है|  भौतिक सुख-साधनों को सर्वोपरि  समझ कर परमार्थ को भूल जाता है| अपने जिम्मे आये कार्यों  को करना नहीं चाहता| केवल भोग भोगना चाहता है, कितनी बड़ी मूर्खता  करता है|
                एक किसान हल चलाता  और खेत की मिटटी को नरम कर उसमें बीज  डालता है| उसके पश्चात् प्राकृत या परमात्मा के अनुग्रह से फसल होती है तथा फल भी प्राप्त होता है| यदि भाग्य में नहीं होता तो वर्षा न होने या कम होने से लाभसे वंचित भी रह जाता है| मगर यदि मेहनत नहीं करेगा, बीज  नहीं बोएगा तो  कितनी ही अच्छी वर्षा से फल लाभ     दायक नहीं हो सकता | ईश्वर की सहायता भी तभी फली भूत होती है जब हम ने अपना कार्य किया हो| केवल आशावादी बनकर कर्म-विमुख जीवन निरर्थक है| बिना बीज बोए तो अनपेक्षित झाड़-झंखाड़ ही पैदा होंगे और शेष जीवन उन झाड़ियों के उखाड़ फेंकने में ही बीत जाएगा|

कर्म ही कर्तव्य है
किसी गाँव में एक धनी सेठ रहता था। उसके बंगले के पास एक जूते सिलने वाले गरीब मोची की छोटी सी दुकान थी। उस मोची की एक खास आदत थी कि जो जब भी जूते सिलता तो भगवान के भजन गुनगुनाता रहता था। लेकिन सेठ ने कभी उसके भजनों की तरफ ध्यान नहीं दिया । एक दिन सेठ व्यापार के सिलसिले में विदेश गया और घर लौटते वक्त उसकी तबियत बहुत ख़राब हो गयी । लेकिन पैसे की कोई कमी तो थी नहीं सो देश विदेशों से डॉक्टर, वैद्य, हकीमों को बुलाया गया लेकिन कोई भी सेठ की बीमारी का इलाज नहीं कर सका । अब सेठ की तबियत दिन प्रतिदिन ख़राब होती जा रही थी। वह चल फिर भी नहीं पाता था , एक दिन वह घर में अपने बिस्तर पे लेटा था अचानक उसके कान में मोची के भजन गाने की आवाज सुनाई दी,आज मोची के भजन कुछ अच्छे लग रहे थे सेठ को, कुछ ही देर में सेठ इतना मंत्र मुग्ध हो गया कि उसे ऐसा लगा जैसे वो साक्षात परमात्मा से मिलन कर रहा हो।
                   मोची के भजन सेठ को उसकी बीमारी से दूर लेते जा रहे थे। कुछ देर के लिए सेठ भूल गया कि वह बीमार है उसे अपार आनंद की प्राप्ति हुई । कुछ दिन तक यही सिलसिला चलता रहा, अब धीरे धीरे सेठ के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा।
                 एक दिन उसने मोची को बुलाया और कहा:- मेरी बीमारी का इलाज बड़े बड़े डॉक्टर नहीं कर पाये लेकिन तुम्हारे भजन ने मेरा स्वास्थ्य सुधार दिया। ये लो 1000 रुपये इनाम, मोची खुश होते हुए पैसे लेकर चला गया । लेकिन उस रात मोची को बिल्कुल नींद नहीं आई वो सारी रात यही सोचता रहा कि इतने सारे पैसों को कहाँ छुपा कर रखूं और इनसे क्या क्या खरीदना है ?
इसी सोच की वजह से वो इतना परेशान हुआ कि अगले दिन काम पे भी नहीं जा पाया। अब भजन गाना तो जैसे वो भूल ही गया था, मन में खुशी थी पैसे की।
               अब तो उसने काम पर जाना ही बंद कर दिया और धीरे धीरे उसकी दुकानदारी भी चौपट होने लगी । इधर सेठ की बीमारी फिर से बढ़ती जा रही थी ।एक दिन मोची सेठ के बंगले में आया और बोला सेठ जी आप अपने ये पैसे वापस रख लीजिये, इस धन की वजह से मेरा धंधा चौपट हो गया, मैं भजन गाना ही भूल गया। इस धन ने तो मेरा परमात्मा से नाता ही तुड़वा दिया। मोची पैसे वापस करके फिर से अपने काम में लग गया ।
               मित्रों ये एक कहानी मात्र नहीं है ये एक सीख है कि किस तरह हम पैसों का लालच हमको अपनों से दूर ले जाता है, हम भूल जाते हैं कि कोई ऐसी शक्ति भी है जिसने हमें बनाया है। आज के माहौल में ये सब बहुत देखते को मिलता है लोग 24 घंटे सिर्फ जॉब की बात करते हैं, बिज़निस की बात करते हैं, पैसों की बात करते हैं। हालाँकि धन जीवन यापन के लिए बहुत जरुरी है लेकिन उसके लिए अपने अस्तित्व को भूल जाना मूर्खता ही है।
                 आप खूब पैसा कमाइए लेकिन साथ ही साथ अपने माता -पिता की सेवा करिये , दूसरों के हित की बातें सोचिये और भगवान का स्मरण करिये यही इस कहानी की शिक्षा है.

शुभचिंतक

एक सेठ जी थे जिनके पास काफी दौलत थी और सेठ जी ने उस धन से निर्धनों की सहायता की, अनाथ आश्रम एवं धर्मशाला आदि बनवाये। इस दानशीलता के कारण सेठ जी की नगर में काफी ख्याति थी। सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी एक बड़े घर में की थी परन्तु बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण उसका पति जुआरी, शराबी, सट्टेबाज निकल गया जिससे सब धन समाप्त हो गया। बेटी की यह हालत देखकर सेठानी जी रोज सेठ जी से कहती कि आप दुनिया की मदद करते हो मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी मदद क्यों नहीं करते हो। सेठ जी कहते कि भाग्यवान जब तक बेटी-दामाद का भाग्य उदय नहीं होगा तब तक मैं उनकी कीतनी भी मदद भी करूं तो भी कोई फायदा नहीं। जब उनका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब मदद करने को तैयार हो जायेंगे। परन्तु मां तो मां होती है, बेटी परेशानी में हो तो मां को कैसे चैन आयेगा। इसी सोच-विचार में सेठानी रहती थी कि किस तरह बेटी की आर्थिक मदद करूं। एक दिन सेठ जी घर से बाहर गये थे कि तभी उनका दामाद घर आ गया। सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और बेटी की मदद करने का विचार उसके मन में आया कि क्यों न मोतीचूर के लड्डूओं में अर्शफिया रख दी जाये जिससे बेटी की मदद भी हो जायेगी और दामाद को पता भी नही चलेगा। यह सोचकर सास ने लड्डूओ के बीच में अर्शफिया दबा कर रख दी और दामाद को टीका लगा कर विदा करते समय पांच किलों शुद्ध देशी घी के लड्डू जिनमे अर्शफिया थी वह दामाद को दिये। दामाद लड्डू लेकर घर से चला। दामाद ने सोचा कि इतना वजन कौन लेकर जाये क्यों न यहीं मिठाई की दुकान पर बेच दिये जायें। और दामाद ने वह लड्डुयों का पैकेट मिठाई वाले को बेच दिया और पैसे जेब में डालकर चला गया।
                      उधर सेठ जी बाहर से आये तो उन्होंने सोचा घर के लिये मिठाई की दुकान से मोतीचूर के लड्डू लेता चलू और सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू मांगे मिठाई वाले ने वही लड्डू का पैकेट सेठ जी को वापिस बेच दिया जो उनके दामाद को उसकी सास ने दिया थे। सेठ जी लड्डू लेकर घर आये सेठानी ने जब लड्डूओ का वही पैकेट देखा तो सेठानी ने लड्डू फोडकर देखे अर्शफिया देख कर अपना माथा पीट लिया। सेठानी ने सेठ जी को दामाद के आने से लेकर जाने तक और लड्डुओं में अर्शफिया छिपाने की बात सेठ जी से कह डाली। सेठ जी बोले कि भाग्यवान मैंनें पहले ही समझाया था कि अभी उनका भाग्य नहीं जागा। देखा मोहरें ना तो दामाद के भाग्य में थी और न ही मिठाई वाले के भाग्य में।
                     इसलिये कहते हैं कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले न किसी को कुछ मिला है और न मिलेगा।

मोची का लालच

बहुत पुराने समय की  बात है एक गांव  मे अमर नाम का एक गरीब ब्राहमण रहता था| इधर उधर से मांग कर अपना और अपने परिवार का गुजारा  बड़ी  मुश्किल  से चलाता  था|वहीँ पास के गांव मे एक नामी  सेठ घनश्याम दास भी रहता था| सेठ घनश्याम दास की  कोई औलाद नहीं थी| सेठ जगह जगह अपनी औलाद के लिए प्रार्थना करता और धरम करम के काम भी करवाता रहता था आखिर भगवान्  ने उस की सुन ली | सेठ घनश्याम दास के घर एक सुन्दर सा बेटा पैदा हुआ| सेठ घनश्याम दास ने पुत्र रतन पाने पर भगवान्  का शुक्रिया  अदा किया और इस ख़ुशी मे एक दावत का आयोजन किया जिस मे आस पास के सभी ब्राहमणों को बुलावा भेजा| यह बात गरीब ब्राहमण अमर के कानों मे भी पड  गयी|

दावत मे ३६ प्रकार के भोजन होंगे यह सोचते ही अमर के मुंह मे पानी आ गया| और उस ने भी दावत मे शामिल होने की सोची लेकिन अगले ही पल उदास हो गया क्योँ कि खाना खाने के बाद टीका लगते समय कोई मंत्र या श्लोक बोलना होता था| जो बेचारे गरीब अमर को नहीं आता था| अमर ने फिर भी हिम्मत नहीं हांरी  सोचा कम से कम भर पेट खाना तो मिलेगा ही आगे जो होगा देखा जाएगा भगवान् भली करेंगे? अमर साफ सुथरे कपडे  पहन कर कंधे मै अंगोछा लटकाए सेठ घनश्याम दास के घर की तरफ चल दिया| वहां जा कर क्या कहूँगा यह सोचते सोचते वह एक तालाब के नजदीक से गुजरा| तालाब के नजदीक से गुजरते समय उसने देखा कि कुछ मेढक तालाब के किनारे धूप  सेक रहे थे| अमर के तालाब  के नजदीक जाते ही मेढ़को  ने पानी मे छलाग लगा दी| मेढ़को के पानी मे छलाग लगाते  ही पानी की बूंदें इधर उधर बिखर गयीं और तालाब के पानी मे लहरें हिलने लगीं | इस दृश्य को देख कर अमर के मनमे एक ख्याल आया और उस के मुंह से निकल पढ़ा" छिटपित छिटपित उप्पर छटकायो पानी, जो तुम ने करी सो हमने जानी"|

अमर का चेहरा खिल उठा उसने सोचा कि टीका लगाते समय के लिए यह श्लोक ही ठीक रहेगा| वह इस श्लोक को याद करता हुआ सेठ घनश्याम दास के घर पहुँच गया| यहाँ उसने देखा कि बहुत बड़े  बड़े  विद्वान पहुंचे हुए हैं और काफी चहल पहल है| अमर भी एक तरफ हो कर बैठ गया| कुछ समय बाद खाने का बुलावा आया सभी लोग खाने को बैठ गए अमर भी बैठ गया| खूब डट कर खाया  आनंद आ गया |
                   खाना खाने के बाद अब बारी  आई टीका लगाने की तो अमर ने देखा की यहाँ तो ब्राहमण एक से बढ़ कर एक श्लोक या मंत्र बोल रहे थे अमर का दिल घबराया, पर अब क्या हो सकता था जब आ ही गया था| अमर ने हिम्मत से काम  लिया और जब उसकी बारी आई तो उसने डरते हुए धीरे से मंत्र बोल दिया जो उसे तालाब के किनारे सुझा था| घबराहट मै उसकी आवाज साफ नहीं सुन रही थी| सेठ घनश्याम दास ने मंत्र दुबारा कहने को कहा तो अमर ने डरते हुए जोर से बोल दिया "छिटपित छिटपित उप्पर छटकायो पानी, जो तुम ने करी सो हमने जानी"| सेठ को ये शब्द अच्छे  लगे और उसने इन्हे एक तख्ती मै लिख कर लटका दिया| ब्राहमण अमर को काफी सारा धन दे कर विदा कर दिया| अमर धन पाकर बहुत खुश हो गया और सेठ को आशीर्वाद दे कर ख़ुशी ख़ुशी अपने घर को चला गया|
                    सेठ घनश्याम दास की अपने पडोसी  सेठ जीवन दास से पुरानी  दुश्मनी थी| घनश्याम दास के ज्यादा पैसे वाला  होने की वजह से जीवन दास उस का कुछ भी बिगाड़  नहीं सकता था| घनश्यामदास और जीवन दास का नाई एक ही था |

 जीवनदास ने उस नाई को लालच दे कर कहा कि तुम मेरा एक काम  कर सकते हो,अगर तुम मेरा काम कर दो तो मै तुम्हें मुह माँगा इनाम दुगा? इस पर नाई ने पूछा क्या काम  है? मै कर दुगा| जीवनदास ने बताया कि जब तुम घनश्यामदास की शेव करोगे तो वह गले के बाल  काटने के लिए अपनी गर्दन ऊपर करेगा तो उस्तरे से उस का गला चीर  देना| पैसे के लालच मे आ कर नाई ऐसा करने को तैयार  हो गया| अगले दिन जब नाई घनश्यामदास के घर शेव करने गया तो शेव करते समय जब घनश्यामदास ने गला ऊपर किया तो उसकी नजर अमर की लिखी तख्ती पर पढ़ गई और वह  बोल उठा "छिटपित छिटपित ऊपर छटकायो  पानी,जो तुम ने करी सो हमने जानी"| नाई के हाथ से उस्तरा नीचे गिर गया और सेठ घनश्यामदास से मांफी मागने लगा| घनश्याम दास के पूछने पर नाई ने सारी   हकीकत बता दी कि किस तरह जीवनदास उसकी हत्या करवाना चाहता था|

उसने नाई को माफ़ कर दिया और आगे से शेव करने घर आने को मना कर दिया| सेठ घनश्यामदास ने भगवान् को धन्यवाद किया और फिर उस गरीब अमर को याद किया जिस की वजह से उस की जान बच गई | सेठ घनश्यामदास ने तुरंत अपना आदमी भेज कर अमर को बुलवाया| अमर बेचारा डर गया पता नहीं सेठ ने क्यों बुलाया है? जब बुलावा आया ही था तो जाना ही था | अमर सेठ घनश्यामदास के घर गया और  हाथ जोड़ कर खड़ा  हो गया | सेठ घनश्यामदास ने उस की अच्छी तरह से खातिरदारी  की और बताया की किस तरह आज अमर के कहे शब्दों  ने घनश्यामदास की जान बचाई| सेठ घनश्यामदास ने अमर को खूब सारा धन दिया और उसका  धन्यवाद किया| अमर ने  सेठ घनश्याम दास को आशीर्वाद दिया और अपने घर आ कर आराम से अपनी जिन्दगी बसर करने लगा|


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