20+ inspirational short stories प्रेरक कहानिया in Hindi
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चतुर खरगोश
एक जंगल में शेर और अन्य प्राणियों के बीच समझौता हुआ था। शेर के भोजन के लिए रोज एक प्राणी को उसकी गुफा में जाना पड़ता था। एक दिन एक खरगोश की बारी आई। उसे शेर के भोजन के समय तक उसकी गुफा में पहुँचना था। खरगोश बहुत चतुर था। उसने दुष्ट शेर को खत्म करने की योजना बनाई। (short stories)खरगोश जानबूझकर बहुत देर से शेर के पास पहुँचा। अब तक शेर के भोजन का समय बीत चुका था। उसे बहुत जोर की भूख लगी थी। इसलिए खरगोश पर उसे बहुत गुस्सा आया।
”तुमने आने में इतनी देर क्यो कर दी?“ शेर ने गरजते हुए पूछा।
”महराज, क्या करूँ?“ खरगोश ने बहुत ही नम्रतापूर्वक जवाब दिया,
”रास्ते में एक दूसरा शेर मिल गया था। वह मेरा पीछा करने लगा। बहुत मुश्किल से मैं उससे पिड छुड़ाकर यहाँ आ पाया हूँ।“
”दूसरा शेर? और वह भी इस जंगल में?“ शेर ने गरजते हुए पूछा।
”हाँ महाराज, दूसरा शेर! वह कहाँ रहता है, यह मुझे मालूम है। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको अभी दिखता हूँ।“ खरगोश ने कहा। शेर खरगोश के साथ तुरंत ही चल पड़ा। खरगोश उसे एक कुएँ के पास ले गया और बोला, ”महराज, यहाँ रहता है वह। आइए, अंदर देखिए।“ शेर ने कुँए में झाँककर देखा। पानी में उसे अपनी ही परछाईं दिखाई दी। उसने उस परछाईं को ही दूसरा शेर समझ लिया और गुस्से में आकर जोर से गर्जना की। उसने देखा कि कुँए का शेर भी उसकी ओर देखकर दहाड़ रहा है। तब शेर अपने गुस्से पर काबू न रख सका। उसने कुएँ में छलाँग लगा दी और पानी में डूबकर मर गया। इस तरह शेर का अंत हो गया।
शिक्षा -बुद्धि ताकत से बड़ी होती है।
गधे का दिमाग
एक था शेर। वह जंगल का राजा था। एक सियार उसका मंत्री था। शेर रोज अपने भोजन के लिये एक जानवर का शिकार करता था। इस शिकार मे से एक हिस्सा सियार को मिलता था। मंत्री के रूप में सेवा करने का यह उसका मेहनताना था।एक दिन शेर बीमार हो गया। वह शिकार करने के लिए गुफा से बाहर नहीं जा सका। उसने सियार से कहा, ”आज मैं शिकार के लिये बाहर नही जा सकता। पर मुझे बहुत जोर की भूख लगी है। तुम जाओ किसी प्राणी को ले आओ ताकि उसे खाकर मै अपनी भूख मिटा सकूँ।“ सियार ने मन में विचार किया, “कोई जानवर अपनी खुशी सेे शेर की गुफा मे नही आयेगा! तो अब मै क्या करूँ!“ बहुत विचार करने पर उसे एक तरकीब सूझी। उसने सोचा “गधा सबसे बेवकूफ प्राणी है। मै उसे झाँसा देकर यहाॅ ला सकता हूँं। “
सियार गधे के पास गया। और बोला, “गधे भाई में तुम्हारे लिए एक खुशखबरी लाया हूँ। जंगल के राजा ने तुम्हे अपना मंत्री बनाने का निश्चय किया है। तुम अभी मेरे साथ चलकर उनसे भेंट कर लो।“ यह सुनकर गधे को बहुत खुशी हुई। वह सियार के साथ शेर की गुफा मे गया उसको देखते ही भूखा शेर उस पर टूट पड़ा और उसे मार डाला। फिर उसने सियार से कहा, “मैं नदी में स्नान करके आता हूँ। तब तक तुम इस शिकार का ख्याल रखना।“ शेर नदी की ओर चला गया। सियार भी बहुत भूखा था। शेर के वापस आने से पहले वह गधे के दिमाग को चट कर गया। जब शेर वापस लौटा उसने गधे की ओर देखा कहा “इस प्राणी का दिमाग कहाँ है ?“(best short stories)
सियार ने मुस्कराते हुए कहा, “महाराज अगर गधे को दिमाग होता तो क्या वह यहाँ आता। गधे को तो दिमाग होता ही नही।“
शिक्षा -धूर्त अपनी चालाकी से नही चूकता
नमक का व्यापारी और गधा
नमक के एक व्यापारी के पास एक गधा था। वह व्यापारी रोज सुबह अपने गधे पर नमक की बोरियाँ लादकर आस पास के गाँवो मे नमक बेचने ले जाया करता था।आसपास के गाँवो में जाने के लिए उसे कई नाले और छोटी-छोटी नदियाँ पार करनी पड़ती थीं। एक दिन नदी पार करते समय गधा अचानक पानी में गिर पड़ा इससे गधे के शरीर पर लदा हुआ ढेर-सारा नमक पानी में घुल गया अब गधे का बोझ काफी हल्का हो गया। उस दिन गधे को अच्छा आराम मिल गया। inspired stories
दूसरे दिन वह व्यापारी रोज की तरह गधे पर नमक की बोरियाँ लाद कर नमक बेचने निकला। उस दिन पहले नाले को पार करते समय गधा जानबूझ कर पानी मे बैठ गया।
उसकी पीठ का बोझ फिर हल्का हो गया। व्यापारी उस दिन भी गधे को लेकर वापस लौट आया। पर नमक के व्यापारी के ध्यान मे आ गया कि आज गधा जानबूझकर पानी मे बैठ गया था। उसे गधे पर बहुत गुस्सा आया। इसलिए डंडे से उसने गधे की खूब पिटाई की। उसने कहा, “मूर्ख प्राणी, तू मुझसे चालाकी करता है। मैं तुझे सबक सिखाए बिना नही रहूगाँ।“ अगले दिन व्यापारी ने गधे पर रूई के बोरे लादे गधे ने फिर वही तरकीब आजमाने की कोशिश की, नाला आते ही वह पानी मे बैठ गया। इस बार उल्टा ही हुआ। रूई के बोरो ने खूब पानी सोखा और गधे की पीठ का बोझ पहले से कई गुना बढ़ गया। पानी से बाहर आने मे गधे को खूब मेहनत करनी पड़ी। उस दिन के बाद से गधे ने पानी मे बैठने की आदत छोंड दी।
शिक्षा -मूर्ख सबक सिखाने से ही काबू में आते है।
मकड़ी की सीख
एक बार दो राजाओ के बीच युद्ध छिड़ गया। उनमें से एक राजा पराजित हो गया। वह जंगल की ओर भाग गया। उसने एक गुफा में शरण ली। विजयी राजा ने उसका पीछा करने के सैनिक भेजे। वह उसे जान से मार डालना चाहता था। पराजित राजा बहुत बहादुरी से लड़ा था। पर उसकी सेना थोड़ी थी। शत्रु की विशाल सेना ने उसकी छोटी सी सेना को हरा दिया था। मजबूर होकर अपनी जान बचाने के लिए उसे जंगल मे भागना पड़ा। वह बहुत दुःखी हो गया और हिम्मत हार बैठा।एक दिन उदास होकर राजा गुफा मे लेटा हुआ था। तभी उसका ध्यान एक छोटी-सी मकड़ी की ओर गया। वह गुफा की छत के एक कोने मे जाला बुनने का प्रयत्न कर रही थी। वह सरपट दीवार पर चढ़ती। बीच में जाले का कोई धाागा टूटता और वह जमीन पर आ गिरती। बार-बार यही होता रहा पर मकड़ी हिम्मत नहीं हारी। वह बार-बार प्रयास करती रही। आखिरकार जाला बुनते-बुनते वह छत तक पहुँचने मे सफल हो गयी। उसने पूरा जाला बुन-कर तैयार कर दिया। राजा ने सोचा, “यह रेंगनेवाली नन्ही-सी मकड़ी बार-बार असफल होती रही, लेकिन इसने प्रयास करना नही छोड़ा। मैं तो राजा हूँ। फिर मैं प्रयास करना क्यों छोड़ दूँ। मुझे फिर से प्रयत्न करना चाहिए।“ उसने दुश्मन से एक बार फिर युद्ध करने का निश्चय किया। kids stories
राजा जंगल से बाहर निकलकर अपने विश्वासपात्र सहयोगियों से मिला। उसने अपने राज्य के शूर-वीरो को एकत्र किया। और शक्तिशाली सेना खड़ी की। उसने पूरी ताकत से दुश्मन पर चढ़ाई कर दी।
वह वीरता पूर्वक लड़ा। आखिरकार उसकी विजय हुई। उसे अपना राज्य वापस मिल गया। राजा उस मकड़ी को जिंदगी भर नही भूल सका, जिसने उसे सदा प्रयास करते रहने का सबक सिखाया था।
शिक्षा -असफलताओ से जूझनेवालों को एक दिन सफलता अवश्य मिलती है।
वफादार नेवला
रामदास और सावित्री पति-पत्नी थे। उनके एक पुत्र था। उसका नाम महेश था। उन्होनें अपने घर मे एक नेवला पाल रखा था। महेश और नेवला एक-दूसरे से हिल मिल गए थे दोनो पक्के मित्र।
एक दिन रामदास अपने खेत गया था। सावित्री भी किसी काम से बाहर गई थी। महेश पालने में गहरी नींद में सो रहा था। नेवला पालने के पास बैठ कर उसकी रखवाली कर रहा था।
एकाएक नेवले की नजर साँप पर पड़ी वह महेश के पालने की तरफ सरपट आ रहा था।
नेवले ने उछलकर साँप की गर्दन दबोच ली फिर तो साँप और नेवले में जमकर लड़ाई हुई। अंत में नेवले ने साँप को मार डाला। best stories
थोड़ी देर में नेवले ने सावित्री को आते देखा। मालकिन का स्वागत करने के लिए वह दौड़कर दरवाजे पर जा पहँुचा। सावित्री नेवले के खून से सने मुँह को देख कर चकित रह गयी। उसे शंका हुई कि नेवले ने उसके बेटे को मार डाला। वह गुस्से से पागल हो गई। उसने बरामदे में पड़ा हुआ डंडा उठाया। और जोर से नेवले को इतना मारा कि नेवला तुंरत मर गया। इसके बाद दौड़ती हुई अंदर के कमरे में गई महेश को सुरझित देख कर बड़ी खुशी हुई। उसकी नजर मरे हुए साँप पर पड़ी उसे अपनी गलती समझते देर नही लगी। वह विलाप करने लगी जिस विश्वाशपात्र नेवले ने उसके बेटे की जान बचाई थी, उसी को उसने मार डाला था। उसे अपार दुःख हुआ। मगर अब पश्चाताप करने से कोई फायदा नहीं था।
शिक्षा -बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय।
डरपोक घोड़ा
एक बार एक घोड़ा एक आदमी के पास आया और कहने लगा, भ्ई, मेरी मदद करो। जंगल मे एक बाघ आ गया है। वह मुझे मार डालना चाहता है। आदमी ने कहा, "अरे मित्र चिंता मत करो! वह बाघ तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ सकता। बाघ से मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।घोड़े ने कहा, मैं आपका बहुत अभारी रहूँगा। आदमी ने कहा, "पर तुम्हे एक बात का ध्यान रखना पडे़गा। मैं जैसा कहूँ तुम्हे वैसा ही करना होगा।"
घोडे़ ने कहा, "मुझे क्या करना होगा।"
आदमी ने कहा, "तुम्हे अपनी पीठ पर काठी और मुँह में लगाम डालने की अनुमति देनी होगी।" घोडे़ ने कहा, "तुम जो चाहो, सो करो। पर कृपा करके मुझे उस बाघ से बचाओ।" आदमी ने घोडे़ की पीठ पर काठी कसी। उसने उसके मुँह में लगाम लगाई। इसके बाद वह घोडे़ पर सवार हुआ दौड़ाते हुए अस्तबल मे ले आया। आदमी ने घोड़े को बाँधते हुए कहा, "अब तुम इस अस्तबल में एकदम सुरझित हो। जब मैं तुम्हे बाहर ले जाऊगाँ, तब मैं तुम्हारी पीठ पर सवार रहूँगा। मैं तुम्हारे साथ रहूगाँ। बाघ तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ सकेगा। इसके बाद आदमी ने अस्तबल का दरवाजा बंद किया और चला गया।
अब घोड़ा अस्तबल में कैद हो गया। उसने मन ही मन सोचा मैं यहाँ सुरझित जरूर हूँ। पर स्वतंत्र नही मैंने सुरक्षा प्राप्त की पर अपनी आजादी गवाँ दी। यह तो बहुत बुरा सौदा हुआ। पर अब मैं मजबूर हूँ।
शिक्षा :- स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा किस काम की।
चंडूल और किसान
एक दिन चंडूल ने अपने बच्चो से कहा, “अब फसल तैयार हो गयी है और कटनेवाली है। इस लिए हमें कहीं और घोंसला बना लेना चाहिए।" दूसरे दिन किसान खेत में आया। उसने किसी से बातचीत करते हुए कहा,"कल में अपने रिश्तेदारों को बुलाकर फसल की कटाई करूँगा।"
किसान की यह बात चंडूल और उसके बच्चो ने सुनी बच्चो ने कहा, "माँ जल्दी कर कल सूर्य अस्त होने से पहले हमें यह घोंसला छोड़ देना चाहिए किसान कल फसल की कटाई करने वाला है।" माँ ने कहा, "घबराने की बात नही कल वह फसल की कटाई शुरू ही नही कर सकता।" दूसरे दिन किसान खेत पर आया। उसका कोई भी रिश्तेदार उसकी मदद करने नही पहुँचा था। इसलिए वह खाली हाथ वापस चला गया। जाते जाते उसने कहा कल में अपने पड़ोसियो को बुलाकर लाऊँगा और फसल की कटाई जरूर करूँगा। चूंडल के बच्चो ने फिर अपनी माँ से कहा, "माँ जल्दी कर अब हमें घोंसला छोड़ देना चाहिए पर माँ ने जवाब दिया, रूको! अभी घोंसला छोड़ने की जरूरत नही है।
अगले दिन ठीक वही हुआ, जैसा चंडूल ने सोचा था। किसान का कोई भी पड़ोसी उसकी मदद करने नही पहुँचा। मगर इस बार किसान ने कहा, अब दूसरों के भरोसे बैठे रहने से काम नही चलेगा। कल मैं खुद फसल की कटाई करूँगा।
यह सुनकर चंडूल ने अपने बच्चो से कहा, अब हमें तुरंत इस घोंसले को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि कल किसान जरूर फसल की कटाई करेगा।
शिक्षा -अपना काम अपने ही भरोसे होता है ।
लालची बंटी
बंटी नाम का एक प्यारा लड़का था। उसे टाफियाँ बहुत पसंद थी। एक दिन वह अपनी माँ के साथ अपनी मौसी के घर गया। मौसी बंटी की आदत से परचित थी। इसलिए वह टाफियों से भरा मर्तबान ही उसके लिये खरीद लाईं थीं ।मौसी ने अलमारी से टाफियों का मर्तबान निकाल कर बंटी के सामने रख दिया। बंटी इतनी सारी टाफियाँ देखकर पुलकित हो गया। मौसी ने कहा, बंटी जितनी सारी टाफियाँ चाहिए ले लो। बंटी ने झटपट मर्तबान का ढक्कन खोलकर हाथ भीतर डाल दिया। जितनी टाफियाँ मुटठी में समा सकती थीं, उसने उतनी टाफियाँ मुटठी में भर लीं।
मर्तबान का मुँह बहुत छोटा था। टाफियों से भरी मुटठी मर्तबान के मुँह से बड़ी हो गयी। इस लिए बंटी का हाथ बाहर नही आ रहा था। उसने बहुत कोशिश की अपने दूसरे हाथ से मर्तबान को आगे पीछे बढ़ाया। उसे तेजी से गोल-गोल घुमाया। पर उसका हाथ बाहर नही निकला।
बंटी की परेशानी देख माँ ने कहा, बेटे! अक्ल से काम लो अपनी मुटठी खोलकर कुछ टाफियाँ गिरा दो फिर तुम्हारा हाथ आसानी से निकल आएगा। बंटी ने वैसा ही किया। उसका हाथ आराम से बाहर निकल आया ।
शिक्षा -पेटू बनना अच्छा नही।
चतुर ज्योतषी
सम्राट ने बड़े सम्मान से उसका स्वागत किया और उसे ऊँचे आसन पर बिठाया।
फिर सम्राट ने उसे जन्म कुंडली दी और कहा, "पंडितजी, कृपया मेरी जन्म-कुडंली पढ़कर मेरा भविष्य बताइए।"
ज्योतिषी ने बड़ी सवधानी से सम्राट की कुंडली का अध्यन किया। फिर उसने कहा, "महाराज आपके गृह आपका भविष्य बता रहे हंै, वही मैं आपको बताऊँगा। मै काल्पनिक कहानियाँ नही कहता।"
सम्राट ने कहा," समझ गया आप क्या कहना चाहते ह है। आप निर्भीक होकर मेरा भविष्य बताइए।"
ज्योतिषी ने सम्राट के बारे मे अच्छी अच्छी बातें बताना शुरू किया राजा का चेहरा आनंद से खिल उठा।
भविष्य के बारे मे अच्छी-अच्छी बातें सुनकर उसे बहुत खुशी हुई।
फिर ज्योतिषी ने राजा की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओ के बारे मे बताना शुरू किया। इन बातो को सुनकर राजा बहुत दुःखी हुआ। एक बार तो उसके मन मे इतनी ठेस लगी कि उसने गुस्से मे आकर कहा, "बंद करो अपनी ये वाहियात बातें! अब मुझे सिर्फ यह बताओ कि तुम्हारे ग्रहों की सूचना के अनुसार तुम्हारी मौत कब होने वाली है?"
चतुर ज्योतिषी समझ गया कि सम्राट का आशय क्या है। उसने जवाब दिया," महाराज मेरी मृत्यु आपकी मृत्यु के एक दिन पहले होने वाली है।" सम्राट बहुत गुस्से मे था। वह ज्योतिषी को मृत्युदंड देने वाला था। पर उसने ज्योतिषी के मुख से अपनी मौत की भविष्यवाणी सुनकर अपना इरादा बदल दिया। उसका गुस्सा शांत हो गया। सम्राट ने ज्योतिषी के बुधिमत्तापूर्ण उत्तर की बहुत सराहना की। उसने ज्योतिषी को मूल्यवान उपहार दिए और उसे सम्मान पूर्वक विदा किया ।
राजा सोलोमन और शीबा की रानी
दोनो हार देखने में एक जैसे थे। पर उनमे एक हार असली फूलो का था। और दूसरा कागज का था। उसने राजा से कहा, "हे राजन!यह बताएं कि असली फूलो का हार कौन सा है? और नकली फूलो का हार कौन सा है? आपको सिंहासन पर बैठे बैठे इस बात का निर्णय करना है।" राजा ने दोनो हारो को बडे़ ध्यान से देखा। दोनो एक जैसे दिखाई दे रहे थे। सिर्फ दूर से देखना असली नकली का निर्णय करना मुश्किल था। राजा सोच में पड़ गया आखिर उसे एक तरकीब सूझी। उसके राजमहल के एक ओर हरी भरी फुलवारी थी। उसने अपने एक सेवक को आदेश दिया, "वह बगीचे की ओर वाली खिड़की खोल दो।" खिड़की खुलते ही कुछ मधुमक्खिया अंदर आई। वे रानी के दाॅय हाथ पर मडराने लगी। यह देखते हुए राजा ने कहा, "रानी साहिबा मेरे बगीचे की मक्खियो ने आपके सवाल का जवाब दे दिया। आपके दाहिने हाथ का हार असली फूलो का बना है।" रानी ने आदरपूर्वक राजा का अभिवादन किया। राजन आपने सही उत्तर दिया। मेरे दाहिने हाथ का हार ही असली फूलो का बना है। आप सचमुच बहुत ज्ञानी है।
शिक्षा -जहाँ आँखे निणर्य लेने में असमर्थ हो वहाँ ज्ञान से काम लेना चाहिए।
गरीब आदमी और अमीर आदमी
एक गरीब मोची और एक धनी व्यापारी, दोनो पड़ोसी थे। मोची के घर में ही जूते चप्पल सीने की छोटी सी दुकान थी। काम करते-करते वह अक्सर मौज में आकर गाने लगता। वह बहुत निश्ंिचत मस्तमौला आदमी था। उसे कभी अपने घर के दरवाजे खिड़कियाँ बंद करने की जरूरत नही महसूस हुई। वह रात को भगवान की पूजा करता और मजे से सो जाता।अमीर आदमी इस गरीब, हँसमुख मोची की ओर ईष्र्याभरी नजर से देखा करता। गरीब होने के बावजूद उस मोची को किसी बात की चिंता नही थी। जबकि अमीर आदमी को तरह-तरह की चिंताएँ सताती रहतीं थीं। गाना-गुनगुनाने की बात तो दूर वह खुलकर हँस भी नही सकता था। उसे हमेशा अपनी तथा अपने धन की रक्षा की चिंता सताती रहती थी। रात को वह अपने मकान के सारे दरवाजे खिड़किया बंद कर लेता था। फिर भी, उसे चैन की नींद नही आती थी !
एक दिन अमीर आदमी ने मोची को अपने घर बुलाया। उसने उसे पाँच हजार रूपए दिए और कहा, "लो, ये पैसे रख लो। इन्हे अपने ही पैसे समझो। इन पैसो को मुझे लौटाने की जरूरत नही है।" इतने पैसे पाकर गरीब आदमी को पहले तो बड़ी खशी हुई पर जल्दी ही इन पैसो ने उसके शांति और निश्चिंत जीवन में खलल पैदा कर दी। पैसे पाने पर वह जीवन में पहली बार उसने अपने घर का दरवाजा और खिड़कियाँ बंद कर उनमें चटखनी लगाई। यह देखने के लिए कि पैसे सुरक्षित हैं या नही रात को कई बार उसकी नींद टूटी।
दूसरे दिन बडे़ सवेरे गरीब मोची अपने धनी पड़ोसी के घर पहुँचा। उसने व्यापारी को पाँच हजार रूपए लौटाते हुए हाथ जोड कर कहा, "सेठजी, मेहरबानी करके आप अपना यह पैसा वापस ले लीजिए। इन पैसो ने तो मेरी रात की नींद हराम कर दी। मैं हँसना गाना सब भूल गया।"
शिक्षा -पैसे से हर प्रकार की खुशी नही प्राप्त की जा सकती।
शहर में कितने कौए
बादशाह अकबर अक्सर अपने दरबारियों से अनोखे प्रश्न और तरह-तरह की पहेलियाँ पूछते रहते थे।इस तरह वे अपने दरबारियो की बुद्धि एंव हाजिरजवाबी की परीक्षा लेते रहते थे। एक बार उन्होने अपने दरबारियो से एक विचित्र प्रश्न पूछा। प्रश्न था, इस शहर में कितने कौए हैं?
उन्होने एक-एक कर सभी दरबारियों पर नजर डाली। हर दरबारी खड़ा होता और जवाब न सूझने पर अपना सर झुका लेता। कोई भी दरबारी बादशाह के सवाल का जवाब न दे सका।
इतने में बीरबल ने दरबार में प्रवेश किया। वे सभी दरबारियों से ज्यादा ज्ञानी थे। उन्होने देखा कि सभी दरबारी सिर झुकाए खड़े हैं। वे फौरन समझ गए कि बादशाह ने जरूर कोई जटिल समस्या रखी है।
जिसे कोई दरबारी हल नही कर सका है।
बीरबल ने बादशाह का शिष्टतापूर्वक बादशाह का अभिवादन किया और अपने आसन पर बैठ गए। बादशाह ने उनसे पूछा, "बीरबल, तुम बताओ इस शहर में कितने कौए हैं?" हाजिर जवाब बीरबल फौरन खड़े हो गए। उन्होने जवाब दिया,"हुजूर इस शहर में कुल पचास हजार तीन सौ अठहत्तर कौए हैं"
"मगर, यह बात तुम इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकते हो बीरबल?" बादशाह ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।
बीरबल ने जवाब दिया, "हुजूर यदि आपको इसमें संदेह हो तो गिनवा कर देख लीजिए। अगर वे पचास हजार तीन सौ अठहत्तर से ज्यादा हैं तो इसका मतलब बाहर से कौए अपने मित्रांे रिश्तेदारों से मिलने आए हैं। अगर कम हैं, तो वे अपने रिश्तेदारो से मिलने बाहर गए हैं।"
बदशाह, बीरबल की हाजिरजवाबी से बहुत खुश हुए उन्होने कहा, शाबाश बीरबल, तुम सचमुच लाजवाब हो।
शिक्षा -जैसा सवाल वैसा जवाब।. तो त्याचा नेम चुकवतो
पिपहरीवाला और गाँव के लोग
एक गाँव मे हजारो चूहे थे। गाँव मे ऐसी कोई जगह नही थी जहाँ चूहे ना हो। ये चूहे ढे़रो अनाज खा जाते थे। घर का समान कपड़े कागज पत्र सब कुछ वे कुतर डालते थे। चूहो के कारण गाँव के लोगो को काफी नुकसान उठाना पड़ता था। वे किसी तरह चूहो से छुटकारा पाना चाहते थे। एक दिन पिपहरीवाला उस गाँव मे आया। उसने देखा कि गाँव के लोग चूहो से त्रस्त है। अत उसने गाँव के लोगो से कहा "मै गाँव के सारे चूहो को खत्म कर दूँगा। पर इसके लिए तुम लोगो को मुझे पाँच हजार रूपए देने होगे।" गाँववाला ने पिपहरीवाले को पाँच हजार रूपए देना मंजूर कर लिया। पिपहरीवाला मधुर स्वर मे अपनी पिपहरी बजाने लगा। पिपहरी की अवाज सुनकर सभी चूहे घरो दुकानो गोदामो तथा खेतो खलियानो से निकलकर दौड़ते हुए रास्ते पर आ गए। वे पिपहरी की अवाज सुनकर नाचने लगे। पिपहरी बजाने वाला नदी की ओर चल पडा़। चूहे भी नाचते नाचते उसके पीछे पीछे चल पड़े। वह नदी के पानी मे उतर गया। उसके पीछे चूहे भी पानी मे कूदगए। इस तरह सारे चूहे पानी मे कूदकर मर गए।इसके बाद पिपहरीवाला गाँव मे लौटा। उसने गाँव वालो से अपने पाच हजार रूपए माँगे। पर गाँववालो ने पैसे देने से इनकार कर दिया। पिपहरीवाले ने कहा "तुम लोग बेईमान हो, अब मै फिर से पिपहरी बजा रहा हूँ। इसबार तुमलोगो को पाँच हजार के बजाए दस हजार देने पड़ेगे।" उसने पहले से भी मधुर पिपहरी बजानी शुरू की। पिपहरी की अवाज सुनकर गाँव के सारे बच्चे रास्ते पर आ गए और मस्त होकर नाचने लगे। पिपहरीवाला पिपहरी बजाता रहा बच्चे मस्ती मे नाचते रहे बहुत देर तक यों ही चलता रहा। गाँव के लोग न पिपहरीवाले को पिपहरी बजाने से रोक सके और न ही बच्चो को नाचने से। गाँव के लोगो को लगा कि चूहो कि तरह उनके बच्चो के भी नाचते नाचते प्राण ना निकल जाँए। उन्हे अब पिपहरीवाले को पैसे ना देने का बड़ा पछतावा हुआ।
आखिरकार गाँववालो ने पिपहरीवाले से विनती की। "ये रहे तुम्हारे दस हजार रूपए अपने पैसे लो और पिपहरी बजाना बंद करो।"
पिपहरीवाले ने पिपहरी बजाना बंद कर दिया। पैसे अपनी जेबमे डालकर वह गाँव से चल पड़ा। पिपहरी की अवाज बंद होते ही बच्चो ने नाचना बंद कर दिया। वे अपने अपने घर लौट गए। गाँव के लोगो मे खुशी की लहर दौड़ गई।
शिक्षा -बेईमानी की सजा हमेशा बहुत भारी होती है।
घमंड़ी मोर और बुद्धिमान सारस
एक मोर था। वह बड़़ा ही घमंडी था और अपनी सुंदरता का बखान करता रहता था। वह रोज नदी के किनारे जाता, पानी में अपनी परछाईं देखता और अपनी सुंदरता की तारीफ करता।वह कहता, जरा मेरी पूँछ तो देखो। कितने मनमोहक रंग हैं मेरे पंखों के! वास्तव में मैं दुनिया के सभी पक्षियों से अधिक सुंदर हूँ।
एक दिन मोर को नदी के किनारे एक सारस दिखाई दिया। उसने सारस को देखकर मुँह फेर लिया। सारस का अपमान करते हुए उसने कहा, कितने रंगहीन पक्षी हो तुम! तुम्हारे पंख तो एकदम सादे और फीके हैं।
सारस ने कहा, तुम्हारे पंख सचमुच बहुत सुंदर हैं। मेरे पंख तुम्हारे पंखों जितने सुंदर नहीं हैं। पर इससे क्या होता है? तुम अपने पंखों से ऊँची उड़़ान तो नहीं भर सकते! जबकि मैं अपने पंखों से आसमान में बहुत ऊँचाई तक उड़ सकता हूँ। इतना कहकर सारस उड़ता हुआ आकाश में बहुत ऊँचे चला गया। मोर शर्मिंदगी से उसकी ओर देखता ही रह गया।
शिक्षा -केवल सुंदरता की अपेक्षा उपयोगिता अधिक महत्वपूर्ण हैं।
टेढ़ा पेड़
एक जंगल में एक अजीब टेढ़ामेढ़ा पेड़़ था। उसके तने और ड़ालियों का आकार बहुत भद्दा था। उसके आसपास के अन्य पेड़ सीधे और सुंदर आकार के थे। सुंदर आकारवाले ऊँचे-ऊँचे पेड़ों को देखकर टेढ़ा पेड़ कहता, कितने सुंदर और सीधे हैं ये पेड़! फिर उदास होकर मन-ही-मन बुदबुदाता, कितना अभागा हूँ मैं! आखिर मैं ही इतना टेढ़ामेढ़ा और भद्दा क्यों हूँ?एक दिन एक लकड़हारा उस जंगल में आया। उसने टेढ़े पेड़़ को देखकर कहा, यह पेड़ तो मेरे किसी काम का नहीं है। उसने सुंदर आकारवाले सीधे पेड़ो को हीं पसंद किया और देखते-ही-देखते उन्हें काटकर जमीन पर गिरा दिया।
इसके बाद टेढ़े पेड़ को कभी अपने भद्देपन पर दुख नही हुआ। वास्तव में अपनें भद्देपन के कारण ही वह लकड़हारे की कुल्हाड़ी का शिकार होने से बच गया था।
शिक्षा -तुम्हारे पास जो है, उसी में खुश रहो।
भेडि़या और मेमना
एक मेमना था। एक दिन वह झरने पर पानी पीने गया। वह पानी पी रहा था कि उसी समय एक भेडि़या भी वहाँ पानी पीने के लिए आया। मेमने को देखकर भेडि़ए ने सोचा, इस नन्हे मेमने का मांस निश्चित रुप से बहुत मुलायम और स्वादिष्ट होगा। मुझे अपने आहार के लिए इसका शिकार करना चाहिए।भेडि़या मेमने के पास गया और कहने लगा, तुम मेरे पीने का पानी गंदा कर रहे हो,
मेमने ने कहा, यह कैसे हो सकता है? पानी तो आपकी तरफ से बहकर मेरी तरफ आ रहा है।
भेडि़ए ने कहा, मुझसे बहस मत करो। तुम शायद वही उजड्ड प्राणी हो, जिसने पिछले महीने मुझे गाली दी थी।
मैं तो पिछले महीने पैदा भी नहीं हुआ था। मेमने ने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए कहा।
तो फिर पिछले महीने तेरी माँ ने मुझे गाली दी होगी, कहते हुए भेडि़या बेचारे मेमने पर टूट पड़ा और उसे मार ड़ाला।
शिक्षा -खतरनाक लौगों की छाया से भी दूर रहना चाहिए।
कौए और कबूतर
एक किसान के खेत में रोज कौओं का एक विशाल झुंड आ जाता था। इससे उसकी खड़ी फसल का बहुत नुकसान होता था। किसान इन कौओं से परेशान हो गया था। आखिर उसने क्रुद्ध होकर कौओं को सबक सिखाने का निश्चय किया।एक दिन उसने अपने खेतो में जाल बिछा दिया। जाल के ऊपर उसने अनाज के कुछ दाने बिखेर दिए। कौओ की नजर दानों पर पड़ी। ज्योंही वे दाने चुगने के लिए नीचे उतरे, सब-के-सब जाल में फँस गए। किसान जाल में फँसे कौओं को देखकर बहुत खुश हुआ। उसने कहा, अच्छा हुआ चोरों, अब मैं तुम में से किसी को नहीं छोड़ूँगा। तभी किसान को एक करुण अवाज सुनाई दी। उसे सुनकर किसान को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने ध्यान से जाल में देखा। कौओं के साथ उसमें एक कबूतर भी फँसा हुआ था।
किसान ने कबूतर से कहा, अरे इस टोली में तू कैसे शामिल हो गया? पर मैं तुम्हें भी छोड़नेवाला नही हूँ। बुरे लोगों की संगती का फल तुम्हे भोगना ही पड़ेगा। फिर किसान ने अपने शिकारी कुत्तों को इशारा कर दिया। कुत्ते दौड़ते हुए आ पहुँचे और उन पक्षियों पर टूट पड़े। एक-एक कर उन्होंने सबका काम तमाम कर दिया।
शिक्षा -बुरे लोगों की संगती दुखदायी होती है।
पुण्यात्मा बाघ
एक जंगल में एक बाघ रहता था। वह बहुत बूढ़ा हो गया था। उसमें अब पहलेवाली ताकत और फुर्ती नहीं रह गयी थी। उसने सोचा, "अब मैं शिकार कर नहीं सकता। इसलिए पेट भरने के लिए मुझे कोई अन्य उपाय करना होगा।" बहुत सोचने-विचारने के बाद उस बाघ को एक युक्ति सूझी। उसने घोषणा की, "अब मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ, इसलिए मैं अपनी बाकी जिंदगी पुण्यकर्मो में लगाऊँगा। अब से मैं घास और फल खाकर अपना गुजारा करुँगा और निरंतर प्रभु के नाम का स्मरण करुँगा। इसलिए जंगल के पशु-पक्षियों को मुझसे डरने की अब कोई जरुरत नहीं है।"कुछ भोलेभाले जानवर बाघ की चिकनी-चुपड़ी बातो में आ गए। वे कहने लगे,कितना महान संत है यह! हमें चलकर इसके दर्शन करने चाहिए।इस प्रकार हर रोज कुछ जानवर बाघ के दर्शन के लिए उसकी गुफा में जाने लगे। बाघ इन भोलेभाले जानवरों को देखते ही उन पर टूट पड़ता और उन्ह मारकर खा जाता। इस प्रकार बूढ़ा बाघ आराम से अपना पेट भरने लगा।
एक दिन एक लोमड़ी को इस पुण्यात्मा बाघ के बारे मंे जानकारी मिली। उसने मन-ही-मन कहा, मैं बाघ की बातों पर विश्वास नहीं करती। बाघ भला घास और फल खाकर कैसे जिंदा रह सकता हैं? मैं खुद जाऊँगी और सच्चाई का पता लगाकर रहूँगी।
दूसरे दिन लोमड़ी बाघ की गुफा पहुँची। गुफा के प्रवेशद्वार पर पहुँचकर वह ठिठक गई। वहाँ जमीन पर गुफा में गए हुए जानवरो के पंजों एवं खुरों के निशान पड़े हुए थे। लोमड़ी ने बारीकी से उन निशानों का निरीक्षण किया उसे फौरन पता चल गया कि गुफा में जानेवाले जानवरों के पंजो एवं खुरो के निशान तो दिखाई देते हैं, पर गुफा से बाहर निकलनेवाले किसी जानवर के पैरों के निशान कहीं नहीं हैं। लोमड़ी मन-ही-मन कहा, इस ढोंगी पुण्यात्मा को जिंदा रखने के लिए मैं अपनी जान नही दूँगी। वह गुफा के दरवाजे से लौट आई।
शिक्षा -मक्कार की चिकनी-चुपड़ी बातों के चक्कर में कभी नहीं आना चाहिए।
शेर का हिस्सा
एक घनघोर जंगल था। उस जंगल में अनेक जानवर रहते थे। एक दिन रीछ, भेडि़या, लोमड़ी तथा शेर साथ-साथ शिकार करने निकले। शेर इन सब का अगुआ था। शीघ्र ही उन्होंने एक भैंस पर हमलाकर उसे मार ड़ाला। लोमड़ी ने भैंस के चार हिस्से किए। सभी जानवर अपना-अपना हिस्सा खाने के लिए बेताब हो रहे थे।तभी शेर ने दहाड़ते हुए कहा, "सब लोग शिकार से दूर हट जाओ और मेरी बात सुनो। शिकार का पहला हिस्सा मेरा है। क्योंकि शिकार करने में मैं तुम लोगों का सहयोगी था। दूसरे हिस्से पर भी मेरा ही अधिकार है। क्योंकि शिकार करने में मैं तुम लोगो का अगुआ था। तीसरा हिस्सा भी मेरा ही है। क्योकी यह हिस्सा मुझे अपने बच्चो के लिए चाहिए। अब रहा चौथा हिस्सा! यदि तुम में से किसी को यह हिस्सा चाहिए, तो आ जाओ,मुझसे लड़ाई में जीतकर ले जाओ अपना हिस्सा।
रीछ,भेडि़या और लोमड़ी नें चारो हिस्से शेर को दे दिए और वहाँ से चुपचाप खिसक गए।
शिक्षा -जिसकी लाठी उसकी भैंस
घोड़े को सबक
एक आदमी के पास एक घोड़ा और एक गधा था। एक दिन वह इन दोनों को लेकर बाजार जा रहा था। उसने गधे की पीठ पर खूब सामान लादा था। घोड़े की पीठ पर कोई सामान नहीं था।रास्ते में गधे ने घोड़े से कहा, भाई मेरी पीठ पर बहुत ज्यादा वजन है। थोड़ा बोझ तुम भी अपनी पीठ पर ले लो।
घोड़े ने कहा, बोझ ज्यादा हो या कम, मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं है। यह बोझ तुम्हारा है और इसे तुम्हें ही उठाकर चलना है। मुझसे इसके बारे में कुछ मत कहो।
यह सुनकर गधा चुप हो गया। फिर वे तीनों चुपचाप चलने लगे। थोड़ी देर बाद भारी बोझ के कारण गधे के पाँव लड़खड़ाने लगे और वह रास्ते पर गिर पड़ा। उसके मुँह से झाग निकलने लगा। top stories in hindi
इसके बाद उस आदमी ने गधे की पीठ से सारा सामान उतार दिया।उसने यह सारा बोझ घोड़े की पीठ पर लाद दिया।
चलते-चलते घोड़ा सोचने लगा, यदि मैंने गधे का कुछ भार अपनी पीठ पर ले लिया होता, तो कितना अच्छा होता। अब मुझे सारा बोझ उठाकर बाजार तक ले जाना पड़ेगा।
शिक्षा -दूसरों के दुःख-दर्द में हाथ बँटाने से हमारा दुःख-दर्द भी कम हो जाता है।

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